काना-फूसी: “बताशे इकट्ठा करो, कुर्सी पक्की समझो!”

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विंध्य के कद्दावर नेता जी की निगाहें इस बार सूबे की सबसे ऊँची कुर्सी पर जम चुकी हैं। दिल्ली दरबार में दो बार सुप्रीम लीडर से मुलाकात हो चुकी है, गुजराती समन्वयक पूरी पैरवी में लगे हैं, और अंदरखाने से खबर यही है कि ऊपर से इशारा तो मिल गया है—बस चक्कर बताशों का है!
अब बताशों के बिना सत्ता की मिठास अधूरी है, और नेता जी यह बखूबी जानते हैं। लिहाज़ा, उन्होंने अपने समर्थकों, शुभचिंतकों औऱ सरकारी मुंशीगिरी दल को साफ निर्देश दे दिए हैं—“बताशे इकट्ठा करो, कुर्सी तक रास्ता बनाओ!” पूरे प्रदेश में बड़ी तेजी से मीठी राजनीति का खेल शुरू हो चुका है।
नेता जी के खासमखास एक मुंशी कहते नहीं थक रहे—“बस एक डलिया बताशे का इंतज़ाम हो जाए, उसी दिन कुर्सी ग्रहण का आमंत्रण छप जाएगा!” पर दिक्कत यह है कि सत्ता के बताशों पर कई दावेदार हैं। कोई पुरानी डलिया के सहारे मीठा रस घोलने में लगा है, तो कोई नई मिठास के जरिए बाज़ी मारने की कोशिश में।
मगर ध्यान रहे!..बताशे शक्कर से बनते हैं, बातों से नहीं! अब देखना यह है कि नेता जी की डलिया पहले भरती है या फिर कोई और ज़्यादा मीठा साबित होता है। तब तक बने रहिए द न्यूज एनालिसिस के खास कॉलम ‘काना-फूसी’ के साथ, क्योंकि यहां नेतानगरी और नौकरशाही की ख़बरें मीठी भी हैं और चटपटी भी!

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