रिपोर्ट: प्रज्ञा शर्मा
भोपाल। एक ओर मध्य प्रदेश सरकार लोगों को अक्षय ऊर्जा और सोलर एनर्जी के इस्तेमाल के लिए लगातार प्रोत्साहित कर रही है, वहीं दूसरी ओर शासन ने पंचायतों और शहरी वार्डों में सोलर लाइट, सोलर हाईमास्ट, सोलर ट्री और सोलर स्टड लगाने पर रोक लगाने का निर्णय लिया है। ऊर्जा विभाग की ओर से सभी कलेक्टरों को जारी पत्र में स्पष्ट कहा गया है कि अब इन उपकरणों को सरकारी खर्च से स्थानीय निकायों में स्थापित न किया जाए।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब राज्य और केंद्र स्तर पर स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने की बात लगातार की जा रही है।
ऊर्जा विभाग ने कलेक्टरों को क्या निर्देश दिए?
ऊर्जा विकास निगम ने मुख्य सचिव की मौजूदगी में हुई राज्य स्तरीय समन्वय समिति की बैठक के निर्णय का हवाला देते हुए सभी जिला कलेक्टरों को निर्देश जारी किए हैं। पत्र में कहा गया है कि पंचायतों, वार्डों और स्थानीय निकायों में अब सोलर लाइट, हाईमास्ट, सोलर ट्री और सोलर स्टड जैसे उपकरण सरकारी धन से न लगाए जाएं।
विभाग का तर्क है कि इन उपकरणों की नियमित सफाई और रखरखाव नहीं हो पाता, जिसके कारण ये कुछ समय बाद अनुपयोगी हो जाते हैं। ऐसे में इन पर खर्च किया गया सरकारी पैसा व्यर्थ चला जाता है।
सरकार का तर्क: रखरखाव न होने से हो रही थी धन की बर्बादी
ऊर्जा विभाग के अनुसार, कई जिलों में पहले से लगाए गए सोलर उपकरण समय पर साफ नहीं किए गए। धूल, गंदगी और तकनीकी खराबियों के कारण ये उपकरण जल्द ही काम करना बंद कर देते हैं।
विशेष रूप से पंचायतों और वार्ड स्तर पर इनकी निगरानी और maintenance की जिम्मेदारी स्पष्ट न होने के कारण स्थिति और बिगड़ती गई। इसी को देखते हुए शासन ने फिलहाल इन पर रोक लगाने का फैसला लिया है ताकि सरकारी धन की बर्बादी को रोका जा सके।
बड़ा सवाल: सोलर पर रोक या सिस्टम की विफलता?
इस फैसले ने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा कर दिया है—
क्या समस्या सोलर तकनीक में है, या फिर स्थानीय स्तर पर रखरखाव और जवाबदेही की कमी में?
जब सरकार एक तरफ सोलर ऊर्जा को sustainable future का हिस्सा बता रही है, तब दूसरी तरफ सार्वजनिक स्थानों पर सोलर उपकरणों पर रोक एक नीति विरोधाभास की तरह दिखाई देता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि समाधान उपकरणों पर रोक नहीं, बल्कि maintenance mechanism को मजबूत करना होना चाहिए था।
गांव और शहर दोनों पर असर
इस निर्णय का असर सिर्फ शहरों के वार्डों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ग्रामीण पंचायतों में भी इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा। कई गांवों में सोलर हाईमास्ट और सोलर लाइटें सड़क सुरक्षा और सार्वजनिक रोशनी का अहम माध्यम रही हैं।
ऐसे में सवाल यह भी है कि इनकी जगह वैकल्पिक व्यवस्था क्या होगी।
नीति बनाम ज़मीनी अमल
यह फैसला एक बार फिर इस बात को रेखांकित करता है कि योजनाओं का उद्देश्य तभी पूरा होता है जब उनके रखरखाव और जवाबदेही की मजबूत व्यवस्था हो। वरना तकनीक और नीतियां सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाती हैं।













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