नई शिक्षा नीति के तहत बड़ा बदलाव: अब ‘आर्ट्स’ का छात्र भी चुन सकेगा साइंस और कॉमर्स, लेकिन क्या व्यवस्था तैयार है?

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रिपोर्ट: प्रज्ञा शर्मा 

भोपाल। मध्य प्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था में एक बड़ा नीतिगत बदलाव सामने आया है। नई शिक्षा नीति के तहत अब 12वीं के बाद विद्यार्थियों के लिए विषय चयन की पारंपरिक सीमाएं खत्म की जा रही हैं। सत्र 2026-27 से विद्यार्थी स्कूल में किसी भी स्ट्रीम — आर्ट्स, कॉमर्स या साइंस — से पढ़कर आने के बावजूद कॉलेज में अपनी पसंद का विषय चुन सकेंगे।
इस बदलाव के बाद अब आर्ट्स से 12वीं पास छात्र भी साइंस और कॉमर्स विषयों में प्रवेश ले सकेंगे, जबकि कॉमर्स के विद्यार्थियों के लिए भी साइंस के विकल्प खुल जाएंगे। उच्च शिक्षा विभाग ने इसके लिए एक नई प्रक्रिया तय की है, जिसके तहत विद्यार्थियों को एलिजिबिलिटी इंटरव्यू के आधार पर प्रवेश दिया जाएगा।

यह बदलाव पहली नजर में शिक्षा को अधिक लचीला और छात्र-केंद्रित बनाता है, लेकिन इसके साथ कई गंभीर सवाल भी जुड़े हुए हैं।
क्या बदला है?

अब तक उच्च शिक्षा में स्ट्रीम आधारित सीमाएं स्पष्ट थीं। साइंस के छात्रों के पास अपेक्षाकृत अधिक विकल्प होते थे, जबकि आर्ट्स और कॉमर्स के विद्यार्थियों के लिए विषय चयन सीमित रहता था।

नई नीति के बाद: आर्ट्स का छात्र साइंस या कॉमर्स चुन सकेगा

कॉमर्स का छात्र साइंस में प्रवेश ले सकेगा साइंस का छात्र अन्य संकायों में जा सकेगा सरकार इसे नई शिक्षा नीति की उस सोच से जोड़ रही है, जिसमें शिक्षा को rigid stream system से बाहर निकालकर flexible बनाया जा रहा है।

सबसे बड़ा सवाल: क्या सिर्फ इंटरव्यू पर्याप्त है?

नीति में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर है कि क्या केवल एक इंटरव्यू के आधार पर किसी विद्यार्थी को कठिन विषयों के लिए पात्र माना जा सकता है।

उदाहरण के तौर पर, अगर कोई छात्र 12वीं तक आर्ट्स पढ़ता रहा है, तो क्या वह कॉलेज स्तर पर फिजिक्स, केमिस्ट्री या मैथ्स जैसे विषयों को सहजता से समझ पाएगा? इसी तरह साइंस या आर्ट्स पृष्ठभूमि का छात्र अकाउंट्स और कॉमर्स के जटिल विषयों में कितना सहज होगा?
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की छूट के साथ ब्रिज कोर्स, फाउंडेशन क्लास या न्यूनतम योग्यता शर्तें भी जोड़ी जानी चाहिए थीं।
पहले के अनुभव क्या कहते हैं?

मध्य प्रदेश में इससे पहले BBA और BCA जैसे कोर्सेस में सभी स्ट्रीम के विद्यार्थियों को प्रवेश की छूट दी जा चुकी है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कोर्सेस में अलग-अलग पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थियों के परिणामों पर सवाल उठे हैं।

कई शिक्षकों का मानना है कि बिना विषयगत आधार के प्रवेश देने से छात्रों पर शैक्षणिक दबाव बढ़ता है, जिसका असर सीधे परिणामों पर दिखता है।
नीति से अवसर बढ़ेंगे, लेकिन तैयारी भी जरूरी नई शिक्षा नीति का यह कदम विद्यार्थियों के लिए अवसरों के नए दरवाजे खोलता है। खासतौर पर उन छात्रों के लिए, जिन्हें 11वीं-12वीं में स्ट्रीम चुनते समय सीमित विकल्पों में निर्णय लेना पड़ा था।

लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि इस बदलाव को केवल “खुली छूट” तक सीमित न रखा जाए। यदि व्यवस्था में शैक्षणिक सहायता, विषयगत तैयारी और अकादमिक सपोर्ट शामिल नहीं होगा, तो यह नीति छात्रों के लिए अवसर से ज्यादा चुनौती बन सकती है।

बुनियादी सवाल

शिक्षा में लचीलापन स्वागतयोग्य है, लेकिन सवाल यही है-
क्या व्यवस्था विद्यार्थियों को इस बदलाव के लिए तैयार करने के स्तर पर भी उतनी ही मजबूत है?


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