11 अप्रैल को आज पूरा देश महात्मा ज्योतिबा फुले की जयंती मना रहा हैं—एक ऐसे क्रांतिकारी समाज सुधारक, जिन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव, अंधविश्वास और महिला विरोधी सोच के विरुद्ध आजीवन संघर्ष किया। उनका जीवन और कार्य आज भी सामाजिक न्याय, शिक्षा और समता की लड़ाई लड़ने वालों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
शिक्षा के क्षेत्र में ऐतिहासिक पहल
ज्योतिराव फुले ने उस समय में महिला शिक्षा की नींव रखी जब समाज में स्त्रियों को पढ़ना-लिखना पाप समझा जाता था। उन्होंने 1848 में पुणे में देश का पहला महिला विद्यालय खोला, जिसकी शिक्षिका थीं उनकी पत्नी, सावित्रीबाई फुले। यह कार्य इतना क्रांतिकारी था कि उन्हें समाज की कड़ी आलोचना और विरोध का सामना करना पड़ा, पर वे अपने रास्ते पर डटे रहे।
शूद्रों-अतिशूद्रों की आवाज बने
महात्मा फुले ने उस समय की ब्राह्मणवादी व्यवस्था को खुली चुनौती दी। उन्होंने ‘गुलामगिरी’ जैसी पुस्तकें लिखकर जातीय अत्याचारों का पर्दाफाश किया और दलित-पिछड़े समाज को आत्मसम्मान और अधिकारों के लिए संगठित किया। उन्होंने सत्यशोधक समाज की स्थापना की, जो जातिवाद और अंधश्रद्धा के विरुद्ध एक आंदोलन था।
स्त्री-सशक्तिकरण के अग्रदूत
फुले मानते थे कि स्त्री की मुक्ति के बिना समाज की मुक्ति संभव नहीं है। उन्होंने विधवाओं के पुनर्विवाह का समर्थन किया और बाल-विवाह का विरोध किया। सावित्रीबाई के साथ मिलकर उन्होंने समाज में महिलाओं के लिए शिक्षा, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की मशाल जलाई।
आज के दौर में फुले क्यों ज़रूरी हैं?
आज जब हम जातिगत भेदभाव, लैंगिक असमानता और शिक्षा की कमी से जूझ रहे हैं, तब फुले के विचार और उनके संघर्ष पहले से भी अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। उन्होंने बताया कि समाज का असली उत्थान तभी संभव है जब सबसे पिछड़े और वंचित वर्ग को समान अवसर और सम्मान मिले।
महात्मा ज्योतिबा फुले सिर्फ एक सुधारक नहीं थे, वे सामाजिक क्रांति के प्रणेता थे। उनकी जयंती पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम उनके दिखाए रास्ते पर चलते हुए शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय की मशाल को आगे बढ़ाएंगे।















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