“सच की राह आसान नहीं होती, लेकिन अगर हिम्मत और धैर्य हो तो इंसाफ ज़रूर मिलता है।” यह कहना है ललित शर्मा का, जिसने खुद को दहेज के झूठे केस से बचाने के लिए वो कर दिखाया जो शायद ही किसी आम व्यक्ति ने किया हो — 500 से ज्यादा सबूत इकट्ठा कर कोर्ट के सामने पेश किए और अपनी पैरवी भी खुद की।
प्रेम विवाह से शुरू हुई कहानी
राजस्थान के अजमेर निवासी ललित शर्मा ने 29 जनवरी 2017 को उज्जैन के महिदपुर की एक युवती से प्रेम-विवाह किया। शादी का पूरा खर्च ललित के परिवार ने उठाया और कुछ महीनों बाद 29 दिसंबर 2017 को एक बेटी का जन्म हुआ। शुरुआती वर्षों में दंपति का जीवन सामान्य और खुशहाल था।
अचानक टूटा भरोसा
अप्रैल 2023 में पत्नी बिना किसी स्पष्ट कारण के बेटी को लेकर मायके चली गई। पहले कुछ समय तक बातचीत होती रही, लेकिन 16 अप्रैल के बाद उसने संपर्क तोड़ दिया और साफ कह दिया कि वह अजमेर नहीं लौटेगी। 17 अप्रैल को ललित ने मुख्यमंत्री और पुलिस अधीक्षक को ट्वीट कर अपनी समस्या बताई।
जब 18 अप्रैल को ललित महिदपुर पत्नी से मिलने पहुंचे, तो वहां उनके साथ दुर्व्यवहार हुआ और पत्नी के चचेरे भाई ने उनके साथ मारपीट की। पुलिस मौके पर पहुंची लेकिन कार्रवाई नहीं हुई।
झूठे केस की पटकथा
19 अप्रैल को पत्नी ने ललित और उनके माता-पिता पर धारा 498ए, 323, 294, 506, 34 IPC और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 व 4 के तहत एफआईआर दर्ज करा दी। आरोप लगाया गया कि ललित ने अजमेर और उज्जैन दोनों जगहों पर उससे मारपीट की।
ध्यान दें:
धारा 498A: पति या ससुराल पक्ष द्वारा क्रूरता
धारा 3/4 (दहेज अधिनियम): दहेज मांगना व देना अपराध
खुद ही लड़ी बेगुनाही की लड़ाई
एफआईआर की सूचना मिलने के बाद ललित डीआईजी अनिल कुशवाह के पास पहुंचे और निष्पक्ष जांच की मांग की। जांच सब-इंस्पेक्टर मानसिंह झाला को सौंपी गई। ललित ने इस दौरान पुलिस को 500 से अधिक सबूत सौंपे — जिनमें डिजिटल रिकॉर्डिंग्स, CCTV फुटेज, लोकेशन डेटा, गवाहों के बयान, कॉल रिकॉर्डिंग्स, व्हाट्सऐप चैट्स और तस्वीरें शामिल थीं।
CCTV फुटेज और कॉल रिकॉर्डिंग्स ने खोली पोल
पत्नी ने आरोप लगाया कि उसे घर से निकाला गया, लेकिन ललित ने अजमेर के अभय कमांड सेंटर से CCTV फुटेज लेकर साबित किया कि वह खुद ही स्टेशन तक छोड़कर आए थे। इसके अलावा एक कॉल रिकॉर्डिंग में पत्नी यह कहते हुए सुनी गई — “कार ले लेना, उसी से लेने आना”, जो यह दर्शाता है कि वह अपनी मर्जी से गई थी।
खुद बने अपने वकील
ललित ने किसी वकील की मदद नहीं ली, बल्कि खुद ही अदालत में अपनी पैरवी की। उन्होंने बेहद सिलसिलेवार ढंग से सारे सबूत पेश किए। कोर्ट ने सबूतों की गहराई को समझते हुए मामले की दोबारा जांच करवाई। जांच में पता चला कि ललित और उनके परिवार पर लगाए गए सभी आरोप झूठे थे। पुलिस ने क्लोज़र रिपोर्ट फाइल कर दी।
अदालत ने की सराहना
कोर्ट ने कहा:
“यह दुर्लभ मामला है, जहां एक आम व्यक्ति ने कानून की सीमाओं में रहकर अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए गहन प्रयास किए।”
कोर्ट ने एफआईआर को झूठा ठहराते हुए केस खारिज कर दिया और पुलिस को निर्देश दिए कि ललित और उनके परिवार को आगे कोई परेशान न किया जाए।
ललित का संदेश
मीडिया से बातचीत में ललित ने कहा — “जिससे जीवन की सबसे बड़ी उम्मीद थी, उसी ने झूठा केस कर दिया। यह मेरे लिए सबसे बड़ा सदमा था। लेकिन मैंने हार नहीं मानी। अगर आप सच के साथ हैं और उसे सही तरीके से सामने रखते हैं, तो कानून भी आपका साथ देता है।”













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