भोपाल। मध्यप्रदेश के सिवनी मालवा में 6 वर्षीय मासूम बच्ची से दुष्कर्म और हत्या के एक दिल दहला देने वाले मामले में विशेष अदालत ने शुक्रवार को आरोपी अजय धुर्वे को फांसी की सजा सुनाई। यह फैसला न केवल अपनी तेज़ सुनवाई (महज 88 दिन में) के कारण उल्लेखनीय है, बल्कि इसलिए भी क्योंकि महिला जज तबस्सुम खान ने अपने फैसले में बच्ची के दर्द को कविता के माध्यम से व्यक्त किया। यह कविता एक संवेदनशील न्यायपालिका की आवाज बन गई है, जो केवल कानून नहीं, बल्कि भावनाओं को भी समझती है।
कैसे हुआ घटना का खुलासा?
यह घटना 2 जनवरी 2025 की रात की है। 6 वर्षीय मासूम बच्ची अपने मामा के घर आई हुई थी। बच्ची की मां और मामा को पता चला कि अजय धुर्वे नामक युवक पलंग के नीचे छिपकर घर में सो रहा है। उन्होंने उसे तुरंत घर से निकाल दिया। जाते-जाते आरोपी ने कहा, “एक लड़की मुझे दे दो।” यह बात उस समय किसी को गंभीर नहीं लगी, लेकिन कुछ ही देर बाद घर में सोई बच्ची अचानक गायब हो गई।
बच्ची की मां ने चारों ओर तलाश की, और शंका जाहिर की कि यह हरकत अजय धुर्वे की हो सकती है। पुलिस को तुरंत सूचना दी गई। उसी रात पुलिस ने अजय को गांव से गिरफ्तार कर लिया। पूछताछ में आरोपी ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि वह बच्ची को जंगल में नहर के किनारे ले गया, उसके साथ बलात्कार किया और फिर मुंह दबाकर उसकी हत्या कर दी।
न्याय की ओर पहला कदम: सख़्त पुलिस कार्रवाई
पुलिस ने तत्परता दिखाई और आरोपी के खिलाफ ठोस साक्ष्य एकत्र किए। बच्ची का शव झाड़ियों में मिला, जिससे पुष्टि हुई कि उसके साथ दरिंदगी हुई थी। मेडिकल रिपोर्ट, आरोपी का स्वीकारोक्ति बयान, घटनास्थल से जुटाए गए सबूत और चश्मदीदों के बयान के आधार पर अदालत में मजबूत चार्जशीट दाखिल की गई।
जनता का आक्रोश और वकीलों का संकल्प
इस वीभत्स घटना के बाद पूरे सिवनी मालवा क्षेत्र में जनआक्रोश फैल गया। लोगों ने जुलूस निकाले, आरोपी को फांसी देने की मांग की। बार एसोसिएशन ने सामूहिक निर्णय लिया कि कोई भी वकील आरोपी का केस नहीं लड़ेगा। इससे स्पष्ट था कि समाज इस बार चुप नहीं बैठेगा।
विशेष लोक अभियोजक ने की सशक्त पैरवी
शासन की ओर से विशेष लोक अभियोजक मनोज जार ने इस केस की सशक्त पैरवी की। अभियोजन पक्ष ने यह साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि आरोपी ने सुनियोजित तरीके से बच्ची को अगवा किया, उसके साथ दुष्कर्म किया और फिर उसकी हत्या की।
अदालत का ऐतिहासिक फैसला: फांसी और प्रतिकार राशि
विशेष न्यायाधीश तबस्सुम खान की अदालत ने 88 दिनों के भीतर यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। आरोपी अजय धुर्वे को फांसी की सज़ा, ₹3000 जुर्माना और पीड़िता के माता-पिता को ₹4 लाख की प्रतिकार राशि देने का आदेश दिया गया। अदालत ने इसे “दुर्लभतम से दुर्लभतम मामला” मानते हुए कठोरतम दंड निर्धारित किया।
जज की कविता: जब न्याय ने लिया संवेदना का रूप
फैसला सुनाते समय विशेष न्यायाधीश तबस्सुम खान ने एक भावुक कविता भी लिखी, जिसमें बच्ची की पीड़ा को उसकी ज़ुबानी बयान किया गया। इस कविता ने पूरे न्यायालय कक्ष को भावुक कर दिया। कविता का शीर्षक था — “हां, फिर एक निर्भया”।
जज तबस्सुम खान द्वारा लिखित कविता की कुछ पंक्तियाँ:
“2 और 3 जनवरी की थी वो दरमियानी रात,
जब कोई नहीं था मेरे साथ।
इठलाती, नाचती 6 साल की परी थी,
मैं अपने मम्मी-पापा की लाडली थी।
…न जाने क्या-क्या किया मेरे साथ,
मैं चीखती थी, चिल्लाती थी,
लेकिन किसी ने न सुनी मेरी आवाज़।”
कविता में यह सवाल भी उठाया गया कि जब एक महिला के साथ ऐसा होता है तो क्या उसे वही इंसाफ़ मिलता है जो निर्भया को मिला था? और क्या वह इंसाफ़ हर बेटी को मिलेगा?
एक मिसाल बन गया यह मामला
सिर्फ 88 दिनों में इस मामले का निपटारा होना न्यायपालिका की संवेदनशीलता, तत्परता और प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह फैसला एक संदेश है उन दरिंदों के लिए जो मासूमियत को कुचलने का दुस्साहस करते हैं।
यह मामला केवल एक बच्ची के साथ हुए अपराध का नहीं, बल्कि उस संवेदनशील न्यायिक प्रक्रिया का उदाहरण है, जहां कानून के साथ-साथ मानवीय संवेदना भी शामिल थी। जज तबस्सुम खान ने यह दिखा दिया कि न्याय केवल सजा देना नहीं, बल्कि पीड़ा को













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