भोपाल। राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं के तहत भूमि अधिग्रहण के मामलों में खंडवा कलेक्टर ऋषभ गुप्ता पर 173 करोड़ रुपये के घोटाले की योजना बनाने का गंभीर आरोप लगा है। आरटीआई कार्यकर्ता विकास पिपरिया ने लोकायुक्त कार्यालय, भोपाल में शिकायत दर्ज कराई है, जिसमें कलेक्टर सहित उनके निजी स्टाफ और स्थानीय नेताओं पर मिलकर रिश्वतखोरी और मुआवजा बढ़ाने के बदले दलाली वसूलने का आरोप है।
कलेक्टर ने क्यों खोली फाइल?
पूर्व कलेक्टर ने राष्ट्रीय राजमार्ग 347बी और 753एल के लिए भूमि अधिग्रहण के 500 से अधिक मामलों की अपील खारिज कर दी थी। लेकिन वर्तमान कलेक्टर ऋषभ गुप्ता ने इन मामलों को दोबारा खोलने की प्रक्रिया शुरू की। इस कदम को लेकर आरोप है कि यह कोई जनहित में लिया गया निर्णय नहीं, बल्कि सुनियोजित “सेटिंग” का हिस्सा है, जिसके तहत मुआवजा राशि बढ़ाकर दलाली वसूलने का रास्ता तैयार किया गया। ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है जब अधिग्रहण मामलों में मुआवजा बढ़ाने को लेकर प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका सवालों के घेरे में आई हो।
50 प्रकरण में करीब 173 करोड़ रुपये बढ़ाने की योजना
शिकायतकर्ता विकास पिपरिया का कहना है कि लगभग 50 प्रकरणों में औसतन 3 से 4 करोड़ रुपये प्रति प्रकरण मुआवजा बढ़ाने की प्रक्रिया में है, जिससे कुल रकम 173 करोड़ रुपये तक जा रही है। इसमें किसानों से प्रति प्रकरण 10 लाख रुपये तक की दलाली लिए जाने का आरोप है। इस पूरे नेटवर्क में कलेक्टर के निजी सहायक विशाल जोशी, रीडर दिलीप हरसूदे, कर्मचारी राकेश दुबे, प्राणेन्द्र राका और कांग्रेस नेता अमित जैन की भूमिका बताई गई है, जो किसानों को अपील के लिए प्रेरित कर रिश्वत लेकर मुआवजा बढ़ाने का भरोसा देते हैं।
रीडर ने कहा- आरोप बेबुनियाद
इस पूरे मामले में जब खंडवा कलेक्ट्रेट के रीडर दिलीप हरसूदे से द न्यूज एनालिसिस ने बात की, तो उन्होंने कहा कि अभी तक किसी भी मामले में कोई आदेश पारित नहीं हुआ है। सारे आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद और तथ्यहीन हैं। उनका कहना है कि कार्य प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है और जो भी अपील आई हैं, वे नियमानुसार विचाराधीन हैं।
विश्लेषण: घोटाले की रूपरेखा!
खंडवा कलेक्टर पर लगे आरोपों का विश्लेषण करें तो यह पूरा मामला एक सुव्यवस्थित साजिश की तरह प्रतीत होता है, जिसमें प्रशासनिक पद का दुरुपयोग करते हुए पुराने अपील प्रकरणों को जानबूझकर फिर से खोला गया। पूर्व कलेक्टर द्वारा खारिज किए गए 500 से अधिक भूमि अधिग्रहण मामलों को नए सिरे से खोलने की कोई सार्वजनिक आवश्यकता या नीतिगत आधार स्पष्ट नहीं है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या इन फाइलों को पुनः खोलने का उद्देश्य किसानों को न्याय दिलाना था या इसके पीछे कोई और “हित” छिपा था?
दूसरी ओर, शिकायत में जिन व्यक्तियों के नाम सामने आए हैं—कलेक्टर के निजी सहायक से लेकर रीडर, कर्मचारी और स्थानीय राजनीतिक नेता तक—वे सभी मिलकर एक संगठित नेटवर्क का हिस्सा लगते हैं, जो किसानों को अपील के लिए प्रेरित कर मुआवजा बढ़ाने का लालच देते हैं और बदले में मोटी रकम वसूलते हैं। औसतन प्रति मामले 10 लाख रुपये की दलाली और कुल 173 करोड़ की मुआवजा वृद्धि की योजना इस बात का संकेत है कि यदि आरोप सही हैं, तो यह सिर्फ एक अफसर की मनमानी नहीं, बल्कि एक संस्थागत भ्रष्टाचार की मिसाल है।
इस मामले में दो बातें प्रमुख रूप से उभरती हैं—पहली, भूमि अधिग्रहण के मामलों में पारदर्शिता की लगातार गिरती साख, और दूसरी, स्थानीय प्रशासन और राजनीतिक नेटवर्क के संभावित गठजोड़ की ओर इशारा। यदि शिकायतकर्ता के आरोप सही साबित होते हैं, तो यह न सिर्फ सरकारी खजाने पर बड़ा हमला होगा बल्कि किसानों की विश्वसनीयता को भी चोट पहुंचेगी।
Khandwa Collector accused of 173 crore land acquisition scam: Complaint lodged in Lokayukta, know in TNA analysis how the entire conspiracy is being hatched?













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