भोपाल में प्रशासन ने अपनी नाकामी छिपाने के लिए पत्रकारिता पर प्रहार कर दिया। कटारा हिल्स थाने में एक पत्रकार पर झूठा मुकदमा ठोक दिया गया। बताया जा रहा है कि यह सब एक नर्मदापुरम के अधिकारी और भाजपा के बड़के नेता की “गहरी मित्रता” का परिणाम है। मतलब पत्रकार को जेल भेजकर उनकी दोस्ती की साख बचाने का खेल खेला गया!
लेकिन यह तो भूल गए कि पत्रकारों की कलम की स्याही को अंगूठे से दवाना तेज़ाब को छूने के जैसा है। जब पांच घंटे तक पुलिस मुख्यालय से कोई जवाब नहीं आया, तो पत्रकारों ने सीधे सड़क पर मोर्चा संभाल लिया। प्रशासन, राजनीति के ऊपरी गलियारों में बैठे लोग सोच रहे थे कि मामला दब जाएगा, लेकिन जैसे ही पत्रकारों ने आवाज बुलंद की, सत्ता की टेबल और कुर्सियां हिलने लगीं।
नतीजा? सिर्फ 15 मिनट की सड़क पर बैठकी और पुलिस महकमे में भूकंप आ गया! आनन-फानन में टीआई का लाइन अटैचमेंट ऑर्डर जारी हो गया, और वो भी पत्रकारों के हाथ में सड़क पर आ गिरा। ऐसा लगा जैसे प्रशासन ने घुटने टेक दिए हों!
लेकिन ध्यान रहे, ये तो महज ट्रेलर है। पत्रकारों को दबाने की जो साजिश रची जा रही है, वो ज्यादा दिन नहीं चलेगी। कुछ लोग अभी भी मीडिया को सेट करने की कोशिश में लगे हैं, लेकिन मशाल जल चुकी है। इस आग को बुझाना अब प्रशासन के बस में नहीं!
क्रांति तो होगी, कलम रुकेगी नहीं!
‘काना-फूसी’ के लिए पढ़ते रहिए द न्यूज एनालिसिस…













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